February 26, 2017
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मैं अपने से पूछा करता।

निर्मल तन, निर्मल मनवाली,
सीधी-सादी, भोली-भाली,
वह एक अकेली मेरी थी, दुनियाँ क्यों अपनी लगती थी?
मैं अपने से पूछा करता।

तन था जगती का सत्य सघन,
मन था जगती का स्वप्न गहन,
सुख-दुख जगती का हास-रुदन;
मैंने था व्यक्ति जिसे समझा, क्या उसमें सारी जगती थी?
मैं अपने से पूछा करता।

वह चली गई, जग में क्या कम,
दुनिया रहती दुनिया हरदम,
मैं उसको धोखा देता था अथवा वह मुझको ठगती थी?
मैं अपने से पूछा करता।

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